हाथ में आईफोन और मर्सडीज की SUV पर बैठा किसान !

0
9

गोदी मीडिया जिसे हमेशा किसान को जहर खाते देखने की आदत थी उसे पिज़्ज़ा खाता किसान हज़म नहीं हो रहा है। नारंगी गैंग कहता है कि अगर कृषि कानून खराब हैं तो सिर्फ पंजाब का किसान ही क्यों विरोध कर रहा, यूपी बिहार का किसान क्यों नहीं कर रहा आंदोलन ??

हकीकत ये है कि देश का अधिकांश किसान अब सिर्फ खेतिहर मजदूर हो कर रह गया है जबकि सिर्फ पंजाब ही ऐसा सूबा है जहां किसान वास्तविक अर्थों में किसान है। इसीलिए कृषि बिल विरोधी आंदोलन में सबसे बड़ी भागीदारी पंजाब के किसानों की है लेकिन देश के लगभग हर प्रांत के किसान इस बिल के खिलाफ है।

तो…..जब हम किसान की बात करते हैं तो हमारे दिमाग में दुबला शरीर, धंसा पेट, मुरझाया चेहरा, धंसी आंखे और मेले कुचैले कपड़े पहने खेतों में काम करते इंसान की छवि घूम जाती है। सरकारी विज्ञापन में ये किसान थोड़ा हुष्ट पुष्ट और साफ सुथरे कपड़े पहने, सर पे पगड़ी बांधे और ट्रैक्टर के साथ दिखाई पड़ता है। सरकारी विज्ञापन उसे खुशहाल दिखाने की भरसक कोशिश करते हैं। लेकिन कहीं भी किसान को धनवान नहीं दिखाया जाता। चाहे फिल्में हों या उपन्यास किसान या तो गरीब दिखेगा या हद्द से हद्द खुशहाल और खाता पीता संपन्न। इसके आगे सब खत्म। 

पूरे देश के किसानों का यही हाल है। यूपी, बिहार, उड़ीसा, बंगाल, तमिलनाडु, गुजरात, महाराष्ट्र सब जगह का किसान बदहाल है। हर साल हजारों किसान खुदकुशी कर लेते हैं। लाखों जीवन भर कर्ज के जाल से नहीं निकल पाते। करोड़ों किसान पीढ़ी दर पीढ़ी, गरीब दर गरीब होते जा रहे। लेकिन पंजाब के किसान इससे अलग तस्वीर पेश करते हैं। Greater Punjab (हरियाणा, पंजाब, हिमाचल और पश्चिमी उत्तरप्रदेश) की बात करें तो यहां का किसान आपको संपन्न ही नहीं समृद्ध भी है। ये समृद्धि केवल आर्थिक नहीं है बल्कि सांस्कृतिक भी है। तकनीक के साथ साथ मेहनत और बाज़ार की समझ ने पंजाब के किसानों को बाकी देश से आगे कर रखा है। ऐसा नहीं है कि यहां के सभी किसान खुशहाल और समृद्ध है। यहां से भी किसानों की खुदकुशी की खबरे आती रहती हैं और यहां भी तमाम किसान ग़रीबी से जूझ रहे हैं लेकिन फिर भी उनका हौसला बरकरार है और वह खेती को अपना मुख्य व्यवसाय बनाए रखना चाहते हैं। 

इसके उलट पूर्वी यूपी  और बिहार का किसान अब सिर्फ खेतिहर मजदूर की हैसियत रखता है। जहां पंजाब में औसत खेत १० एकड़ का होता है वहीं बिहार में ये एक से तीन बीघा होता है। पंजाब का किसान साल में तीन फसल लेता है जबकि यूपी का किसान दो फसल और थोड़ी बहुत सब्जी उगा कर संतोष कर लेता है। पंजाब में खेती पूरी तरह से तकनीक और मशीन आधारित है। यही वजह है ट्रैक्टर और दूसरे कृषि उपकरण बनाने वही कंपनियां पंजाब के लगभग हर शहर में है। जबकि यूपी बिहार अभी ट्रैक्टर से आगे नहीं बढ़ पाया है। हाल ये है कि यूपी बिहार का किसान पंजाब के खेतों में मजदूरी करने जाता है और पंजाब से किसान हार्वेस्टर लाकर यूपी और बिहार में गेहूं धान की कटाई मधाई करते हैं। जिस तरह यूपी बिहार के किसान परिवार से कम से एक सदस्य महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक के कारखानों में नौकरी कर रहा होता है ताकि घर का खर्च चल सके इसी तरह पंजाब के किसान परिवार से कम से कम एक सदस्य या तो कनाडा , ऑस्ट्रेलिया में मिलेगा या फिर सेना में। यही उनकी संपन्नता का राज है।

 यही वजह है कि दिल्ली की सीमा पर घेरा डाले किसानों के बीच मंहगी SUV, iphone, pizza, air-conditioned tent जैसी आधुनिक सुविधाएं सामान्य तौर पे दिखने को मिल रही है। और पंजाब का किसान अपनी इसी legacy और richness को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है और गोदी मीडिया जिसे हमेशा किसान को जहर खाते देखने की आदत थी उसे पिज़्ज़ा खाता किसान हज़म नहीं हो रहा और वह नारंगी गैंग के इशारे पर आंदोलन को खालिस्तानी, माओवादी, पाकिस्तान परस्त बताने मे जुटा है। जबकि पंजाब के किसान इस बात से बेपरवाह डटे हुए हैं कि तीनों काले कानून वह वापस करा कर है दिल्ली से हटेंगा

- Advertisement -

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here